शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

ब्लॉग परिचय

चाहे सुनो अथवा करो वाचन,

लगती है जो सदा सुहावनी।

देवभूमि के हृदय में रहती,

मेरी मातृभाषा कुमाऊँनी।।


सभी पाठकों को सप्रेम नमस्ते या यूँ कहें सादर ब्लॉगस्ते। देवभूमि उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य ने सदियों से देश - विदेश के पथिकों का चित्त अपनी ओर आकर्षित किया है। इसका नैसर्गिक प्रभुत्व ही इसका एकमात्र आकर्षण केंद्र  नहीं है अपितु इसकी सांस्कृतिक विरासत भी सोने पर सुहागे का कार्य करती है। किसी भी संस्कृति के अस्तित्व का केंद्र बिंदु उसकी भाषा हुआ करती है। उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत की आधारशिला यहाँ की  भाषाएँ हैं।
उत्तराखंड में मुख्यतः तीन प्रकार की भाषाएँ प्रसिद्ध हैं :-
१.) कुमाऊँनी
२.) गढ़वाली
३.) जौनसारी

वस्तुतः 'उत्तराखंड' दो प्रशासनिक इकाइयों में बँटा हुआ है - 
१.) कुमाऊँ मंडल
२.) गढ़वाल मंडल।
उत्तराखंड का पूर्वी भाग कुमाऊँ व पश्चिमी भाग गढ़वाल कहा जाता है। इन दोनों मंडलों में कुमाऊँ मंडल के अंतर्गत पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, अल्मोड़ा, नैनीताल और उधमसिंह नगर तथा गढ़वाल मंडल के अंतर्गत उत्तरकाशी, देहरादून, पौड़ी, टिहरी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, चमोली और हरिद्वार जिले आते हैं।
यह ब्लॉग हिंदी भाषा के माध्यम से आपको कुमाऊँनी सीखने में सहायता करेगा। 
भाषा अर्जन की इस यात्रा में आप और हम शनैः शनैः ठीक उसी प्रकार बढ़ेंगे जैसे मनोरम पर्वतीय यात्रा के सौंदर्य को मंद्र गति से हृदयंगम करता हुआ एक नवीनागंतुक कौतुकवश चला करता है।
प्रत्येक पोस्ट के अंत में आप एक कुमाऊँनी लोकोक्ति सीखेंगे।
तो चलिए, आज की लोकोक्ति प्रस्तुत है :-

अन्यारो न्है जांछ जब खुलि जैंछ रात

अर्थात् सवेरे का प्रकाश अंधियारा हटा देता है।

अतः हम सभी के अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा हटा दिया जाए, इसी आशा के साथ आप सभी को नमस्कार।


ब्लॉग परिचय

चाहे सुनो अथवा करो वाचन, लगती है जो सदा सुहावनी। देवभूमि के हृदय में रहती, मेरी मातृभाषा कुमाऊँनी।। सभी पाठकों को सप्रेम नमस्ते ...